लघुशिश्नता क्या है?

असामान्य रूप से छोटे लिंगों के कारण व उपचार

लघुशिश्नता एक शब्द है जो आपके बच्चे की उम्र और रेस के लिए औसत 2.5 मानक विचलन से छोटे लिंग को बताने के लिए उपयोग किया जाता है। इसका अर्थ है कि जन्म के समय खिचे हुए लिंग की 1.9 सेमी (3/4 इंच) से कम लंबाई; वयस्कों में, झूलते हुए 7 सेमी (2-3/4 इंच) से कम लंबाई के लिंग और उत्तेजित लिंग 12.5 सेंटीमीटर (5 इंच) से कम की लंबाई वाले लिंग को लघुशिश्न कहा जाएगा। भ्रूण के विकास के समय, आनुवांशिक विचलन या हार्मोनल असामान्यताओं से जेनेटिक विचलन शुरु हुए हो सकते हैं।

सांख्यिकीय रूप से लघुशिश्नता 0.6 प्रतिशत जनसंख्या में होती है, जो कि एक बेहद दुर्लभ मामला है। यह शब्द सबसे आम तौर पर तब उपयोग किया जाता है जब लिंगों की सभी संरचनाएं, स्क्रोटम, टेस्टिकल्स और पेरिनेम सहित, “सामान्य” होते हैं।

कारण

लघुशिश्नता का विकास गर्भावस्था के दौरान होता है और गर्भावस्था के दौरान अक्सर केवल शारीरिक असामान्यता पर ध्यान दिया जाता है।

इसक संभावित कारणों में से एक, गर्भावस्था के शुरुआती चरण में मानवीय कोर्नियोनिक गोनाडोट्रॉपिन (hCG) के उत्पादन में कमी का होना है।यह एक ऐसा हार्मोन है जो टेस्टास्टोरोन पैदा करने वाले टेस्टीस के विकास को प्रेरित करता है।

14 हफ्तों के बाद, लिंग की लंबाई एक दूसरे हार्मोन के अंतर्गत आ जाती है, जिसे ल्यूटेइंज़ाइनिंग हार्मोन (LH) कहते हैं, जो कि टेस्टिकल्स के तथाकथित लेडिग सेल में टेस्टास्टेरोन को प्रेरित करता है।यदि इन दोवो या किसी एक महत्वपूर्ण हार्मोन का उत्पादन बाधित होता है तो बच्चे के लिंग की लंबाई भी प्रभावित हो सकती है।

जेनेटिक्स भी एक भूमिका निभा सकता है। जबकि कोई एक जीन ऐसी नहीं है जो लघु शिश्नता का कारण हो, इस परिस्तिति को आम तौर पर क्रोमोसोमल विकार से जोड़ा जाता है जिसे ऐंड्रोजेन इनसेंसिटिविटी सिंड्रोम (AIS) क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम, टर्नर सिंड्रोम, और डाउन सिंड्रोम कहते हैं।

इस बात के कोई साक्ष्य नहीं है कि एस्ट्रोजन आधारित फर्टिलिटी दवाएं जैसे डाइएथिलिस्टिलबेस्ट्रॉल (DES) को शुरुआती गर्भावस्था को दौरान लेने से सामान्य से छोटा लिंग आकार हो सकता है। जबकि पर्यावरणीय प्रदूषण कम आम कारणों में से है, कुछ शोध सलाह देते हैं कि गर्भावस्था के दौरान क्लोरिनेटेड पेसिटसाइड्स के प्रति अनावरण से लघुशिश्नता तथा अन्य लैंगिक असामान्यताएं पैदा हो सकती हैं।

निदान

नवजातों में यह जरूरी है कि लघुशिश्नता के निदान के समय डॉक्टर बच्चे के लिंग की सही माप लें। लटके लिंग की लंबाई (FPL) की तुलना में, जिसमें लिंग को किसी पैमाने के समांतर रखा जाता है, एक खींचे हुए लिंग की लंबाई (SPL) का उपयोग किया जाना चाहिए, क्योंकि लड़कों और पुरुषों में यह सटीकता के अधिक निकट होता है।

इसके लिए डॉक्टर को पैमाने को प्यूबिस के आधार पर स्थिर रूप से रखना होता है। फिर लिंग को कैलीपर्स के सिरों से ग्लैन्स (शीर्ष) के ठीक नीचे पकड़ा जाता है और बिना दर्द के अधिकतम लंबाई तक खींचा जाता है। एक नया सिरिंज जैसा टूल भी अब उपलब्ध है जिससे लिंग के ऊपर रखा जा सकता है और इस अंग को पूरे खिंचाव तक खींचा जा सकता है।

शिशुओं में लघुशिश्नता की पहचान किया जाना महत्वपूर्ण होता है क्योंकि यह संभावित प्रभावी उपचार के लिए अवसर देता है। डॉक्टर को लघुशिश्नता के साथ आम तौर पर संबंधित परिस्थितियों की भी जांच करनी चाहिए, जिसमें पिट्यूटरू ग्रंथि या हाइपोथेलेमस संबंधी समस्याएं भी शामिल हैं।

लघुशिश्नता का निर्धारण

जबकि पूर्ण अवधि के नवजात में 1.9 सेंटीमीटर से कम के SPL की लघुशिश्नता का निदान होता है, बड़े लड़कों और पुरुषों में लघुशिश्नता को उम्र के औसत माध्य से 2.5 मानक विचलन (SD) के कम लंबाई के लिंगे के होने पर निर्धारित किया जाता है।

गाइडलाइन के रूप में, जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी की हैरिएट लेन हैंडबुक लघुशिश्नता का निर्धारण निम्न प्रकार से करती है:

  • 6 से 12 माह: 2.3 सेटीमीटर (0.9 इंच) से कम
  • 1 से 2 साल: 2.6 सेटीमीटर (1.02 इंच) से कम
  • 2 से 3 साल: 2.9 सेटीमीटर (1.14 इंच) से कम
  • 3 से 4 साल: 3.3 सेटीमीटर (1.3 इंच) से कम
  • 4 से 5 साल: 3.5 सेटीमीटर (1.38 इंच) से कम
  • 5 से 6 साल: 3.8 सेटीमीटर (1.5 इंच) से कम
  • 6 से 7 साल: 3.9 सेटीमीटर (1.54 इंच) से कम
  • 7 से 8 साल: 3.7 सेटीमीटर (1.46 इंच) से कम
  • 8 से 9 साल: 3.8 सेटीमीटर (1.5 इंच) से कम
  • 9 से 10 साल: 3.8 सेटीमीटर (1.5 इंच) से कम
  • 10 से 11 साल: 3.7 सेटीमीटर (1.46 इंच) से कम
  • वयस्क: 9.3 सेंटीमीटर (3.66 इंच) से कम

7 की उम्र से औसत लिंग आकार में भिन्नता का कारण वयस्कता में पहुंच रहे लड़कों के विकास में अंतर का होना है। युवावस्था के बाद से लघुशिश्नता को मात्र सेंटीमीटरों से तय कर पाना अधिक कठिन हो जाता है; वयस्कता के पूरे होने तक अल्गोरिदमिक गणनाओं की जरूरत होती है।

लड़कों में अंतर निर्धारित करना

जबकि लघुशिश्नता की क्लीनिकल परिभाषा निदानों के लिए एक स्थिर रोडमैप पेश करती है, लेकिन यह मामला हमेशा नहीं होता है।यह विशेष रूप से 8 साल से ऊपर के बच्चों के मामले में सत्य है।

वास्तव में अधिकांश वयस्कता पूर्व वाले लड़कों में लघुशिश्नता उनके माता-पिता से आती है क्योंकि कम विकसित लिंग में लघुशिश्नता दुर्लभ होती है। अधिकांश मामलों में, लड़का या तो देर से वयस्क होता है, मोटा होता है (अत्यधिक प्यूबिक चर्बी के कारण लिंग की लंबाई कम होती है), या वह सामान्य लिंग की तुलना में बड़े फ्रेम वाला होता है।

इन तरह के मामलों में, “अस्पष्ट लिंग” शब्द अधिक उपयुक्त रूप से लागू होता है। यह पेनोस्कोर्टल वेबिंग (जिसमें स्क्रॉटम लिंग के निचले हिस्से तक बढ़ जाता है, जिससे दोनो के बीच एक अस्पष्ट जोड़ बन जाता है) और मेगाप्रेप्यूस (जिसमें फोरस्किन पीछे नहीं जाती और असामान्य रूप से फूल जाती है) जैसी यह जन्मजात स्थितियों के लिए द्वितीयक हो सकता है।

उपचार

लघुशिश्नता का उपचार बच्चों व वयस्कों में भिन्न-भिन्न होगा।यह देखते हुए कि शिशुओं और छोटे शिशुओं में लिंग अभी भी विकसित हो रहे होते है, टेस्टास्टेरोन उपचार अक्सर महत्वपूर्ण रूप से लिंग वृद्धि को सपोर्ट कर सकता है। सर्जिकल विकल्प, सीमित होते हुए भी, लड़को व पुरुषों में आजमाए जा सकते हैं, जहां पर लिंग अपनी अधिकतम वृद्धि को हासिल कर चुका हो।

उपचार योजना के आधार पर, मेडिकल टीम में बाल-चिकित्सक, यूरोलॉजिस्ट, एन्डोक्राइनोलॉजिस्ट, जेनेटिकिस्ट या साइकोलॉजिस्ट शामिल हो सकते हैं।

टेस्टास्टेरोन थेरेपी

नवजातों व बच्चों में मासिक आधार पर तीन टेस्टास्टेरोन के इंट्रामस्कुलर (IM) इंजेक्शन से लघुशिश्नता का उपचार हो सकता है। शोध दिखाते हैं कि चार-हफ्तों के अंतराल में टेस्टास्टेरोन के तीन इंजेक्शन (25 से 50 मिलीग्राम) दिए जाने पर बच्चे के लिंग आकार को उसकी उम्र की संदर्भ रेंज तक बढ़ाया जा सकता है।

लघुशिश्नता वाले शिशु में खतने को तब तक के लिए टाल देना चाहिए जब तक कि उपचार पूरा ना हो जाए। आम तौर से कहें तो यह थेरेपी 3 साल से कम के बच्चों में सबसे अधिक प्रभावी होती है, लेकिन 8 बरस तक के बच्चों को इसेस लाभ हो सकता है।

लिंग पुर्ननिर्धारण (जेंडर रीअसाइनमेंट)

अतीत में, लघुशिश्नता वाले छोटे बच्चों की लिंग पुर्ननिर्धारण (जेंडर रीअसाइनमेंट) सर्जरी हुई है, जो कि वास्तविक चिकित्सीय जरूरत की तुलना में छोटे लिंग के साथ सामान्य संस्कृति असहजता की प्रतिक्रिया के कारण अधिक थी।आज यह अभ्यास कम हो गया है, जब टेस्टास्टेरोन थेरेपी के संभावित लाभों, बाद के जीवन में महिला से पुरुष हार्मोन थेरेपी की जरूरत, और व्यक्तिगत सहमति की कमी को देखते हुए अधिकांश विशेषज्ञ इसकी जरूरत पर सवाल उठाते हैं।

यदि अपनाएं तो लिंग पुर्ननिर्धारण (जेंडर रीअसाइनमेंट) को आम तौर पर उस उम्र में अपनाया जाता है जब लड़के में सूचित निर्णय लेने की क्षमता आ जाए और वह व्यापक मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन से होकर गुजर चुका हो।

लिंग वृद्धि सर्जरी

लघुशिश्नता वाले कुछ पुरुष लिंग वृद्धि सर्जरी (फैलोप्लास्टी) को अपनाना पसंद करते हैं, जिसकी सफलता का स्तर भिन्न-भिन्न होता है। सस्पेंसरी लिगामेंट रिलीज़ कहे जाने वाले ऐसे किसी ऑपरेशन में उत्तेजना के दौरान लिंग को सहारा देने वाले लिगामेंटों को अलग कर दिया जाता है।

ऐसा करने से लिंग लिंग का कोण 90 डिग्री से कम होने स्थान पर 90 डिग्री से अधिक हो जाता है जिससे लिंग की अधिक लंबाई का आभास होता है। इससे होने वाले संभावित जोखिमों में नस की क्षति, लैंगिक संवेदनशीलता की हानि, स्तंभन दोष और यदि ऑपरेशन वाले स्थान पर घाव ऊतक पनप जाएं तो लिंग की सिकुड़न हो जाना शामिल हैं।

फैलोप्लास्टी के दूसरे प्रारूपों, जैसे फ्लैप सर्जरी (शरीर के दूसरे हिस्से से त्वचा की ग्राफ्टिंग), को कम आम रूप से अपनाया जाता है क्योंकि उनमें अधिक जटिलताओं का जोखिम होता है और उनसे यौन फंक्शन में बाधा हो सकती है।

दूसरी तकनीकों जैसे सिलिकॉन इम्प्लांट (प्रोस्थेसेस), सिंथेटिक डर्मल फिलर्स, और सबकॉशिएस फैट इंजेक्शन्स, आदि से लिंग की लंबाई से अधिक मोटेपन में वृद्धि होती है।यदि लंबाई हासिल हो भी जाए तो इससे फ्लासिड की लंबाई पर ही असर होगा, ना कि उत्तेजित लंबाई पर, जो समान ही बनी रहती है।

कुछ कॉमर्शियल रूप से मार्केट किए जाने वाले लिंग पंप और स्ट्रेचेस हैं जो लिंग की लंबाई में वृद्धि हासिल करने में कोई स्थिर परिणाम नहीं देते हैं। यदि वृद्धि हासिल भी जाए तो वह बहुत मामूली होती है। ये उकरण उन पुरुषों के लिए हैं जिनको स्तंभन दोष की समस्या है, जो कि पूरी तरह से एक भिन्न समस्या है।

जटिलतायें

व्यवहारिक रूप से, लघुशिश्नता से पेशाब करने में कठिनाई हो सकती है क्योंकि इससे धार को दिशा देना कठिन होता है। बहुत से पुरुष बस टॉएलेट में बैठ कर पेशाब करके इस समस्या का समाधान कर लेते हैं।

अधिक महत्वपूर्ण रूप से, लिंग का आकार दो इंच से छोटा होने पर गर्भधारण की संभावना के कम होने से जुड़ा है। और तो और, लघुशिश्नता वाले पुरुषों में शुक्राणुओं की कम संख्या होगी जिसका कारण अंतर्निहित पिट्यूटरी विकार होता है। ऐसे मामलों में सहाय्यित रीप्रोडक्टिव तकनीकें उपलब्ध हैं जो किसी के गर्भधारण की संभावना को महत्पूर्ण रूप से बेहतर कर देती हैं।

भावनात्मक विकास और संबंध पर एक नोट

जबकि ऐसे उपचार उपलब्ध है जो लड़कों के लिंग के आकार को बढ़ा सकते हैं, वास्तविकता यह है कि कुछ लड़के (पुरुष) सामान्य से छोटे आकार के लिंग वाले होंगे।जबकि कुछ लोग यह मानते हैं कि इससे लड़के को अंतर्निहित मनोवैज्ञानिक हानि होगी, वे विश्वास लिंग के आकार को लेकर हमारे सांस्कृतिक मनोभावों को दर्शाते हैं ना कि लड़के के वैयक्तिक अनुभव को।

वास्तव में, दीर्घ अवधि शोध दिखाते हैं कि लघुशिश्नता वाले पुरुष इस मामले में कतई भिन्न नहीं है कि वे औसत से बड़े लिंग आकार के पुरुष की तुलना में अपनी मर्दानगी की छवि को कैसे देखते हैं। और तो और, यह स्थिति पुरुष की कामलिप्सा, यौन फंक्शन, यौन संतुष्टि, स्तंभन हासिल करने की क्षमता, या एकाधिक संतुष्ट यौन संबंधों के साथ कहीं भी दखल देती नहीं दिखती है।

DR. RAJESH CHOWBEY

Admin, Urologist.

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